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इहलीला के संवरण के लिए...

                
                                                         
                            "इहलीला"
                                                                 
                            
कवि : कान्हा त्रिपाठी
गरीब की उस कच्ची झोंपड़ी से शुरू होती है
एक लंबी यात्रा—
लांछना के शहर से,
प्रताड़ना की गलियों से गुजरती हुई,
शोषण के चौड़े राजमार्ग पर चलकर
इप्सित उन ऊँची अट्टालिकाओं की ओर...
जहाँ
रक्त की नदी पर
गरीब की अस्थियों,
मांस और देह से रिसे आँसुओं से
बना होता है
एक भव्य सेतु—
जिस पर कुचलते रौंदते चलकर
दूसरे पहुँचते हैं
ऐश्वर्य की अट्टालिकाओं तक!

उसे बड़े आदमी बनने का स्वप्न नहीं,
बस एक पक्के घर की
छोटी-सी बरामदे में
शांति की एक साँस लेने की चाह है।
मरीचिका की उस मोहक प्रतिछवि को
छू लेने की अभिलाषा में
वामन होकर भी
आकाश के चाँद तक
हाथ बढ़ाने का
दुस्साहस करता है वह।
लेकिन...
उसे क्या पता
स्वप्न की भी जातियां होती है
वह आगे बढ़ता है
और हथेलियों में सहेजकर
उसे अधिकार के हवाले कर
हाथ बढ़ाते ही
काट दिया जाता है
वही हाथ!
असहाय बना दी जाती है
उसकी दुर्दम्य अभिलाषा,
पाँवों तले कुचल दिया जाता है
उसके स्वप्नों का अंकुर।
साम्यवाद की आकांक्षित आवाज़ को
बाँध दिया जाता है
राजनीति की बिसात पर;
क्रांति की गर्जना
आकाश को छूने से पहले ही
दम घोंट दिया जाता है
उठती हुई प्रतिरोध की आवाज़ का।
अकर्मण्य कहकर
उपेक्षित कर दी जाती है
वह विचारधारा;
धकेल दिया जाता है उसे
निस्तब्ध कोठरी के
बंद कैदखाने तक।
एकाएक लगा दी जाती है मौन मुहर
फिर भी—
पेट में पलती
भूख की ज्वाला,
परिवार की गोद में
खेलते बच्चे की चीख,
पेट की हूक,
बुभुक्षा की असहनीय करुण पुकार—
सब कुछ मिलकर
फिर उठाता है
एक आखरी आवाज़!
लेकिन...
बस!
कुछ क्षणों के विराम के बाद
धीरे-धीरे थम जाती है
वह आवाज़...
हमेशा के लिए!
लाल रक्त की बूँदें
छिटक पड़ती हैं
चिता पर;
अग्नि की जिह्वा के लपटें
निगल जाती हैं
एक जीवन के
अधूरे स्वप्न को...
और फिर—
न प्रतिरोध बचता है,
न प्रश्न,
न अभिलाषा...
केवल रह जाता है
राख के नीचे दबा हुआ
एक मौन इतिहास!
अंतरात्मा से कहराती हुई
एक आवाज
क्या यह निर्मम जन्म, सिर्फ !!
एक चिरंतन विश्राम के लिए...
इहलीला के संवरण के लिए...
इहलीला के संवरण के लिए...
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4 घंटे पहले

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