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कभी लगा तुम ज़िंदगी हो,

                
                                                         
                            कभी लगा तुम ज़िंदगी हो,
                                                                 
                            
कभी लगा तुम मेरी आँखों की तलाश हो,
कभी लगा तुम मेरी रूह हो,
कभी लगा तुम इश्क़ हो,
कभी लगा रब का इशारा हो।

हम ढूँढते ही रह गए,
न दिल को कोई किनारा हो।
अजब फ़क़्र था उस उल्फ़त में, ऐ “कमरुन”, उम्र भर,
सब कुछ मिल गया मगर,
उनका पता दुबारा न हो।
- कमरुन नदाफ
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2 महीने पहले

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