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चाण्डाल योग

                
                                                         
                            चुप्पियां !
                                                                 
                            
तोड़ी जा सकती थी,
हुंकार
भरी जा सकती थी ,
बढ़े हुए नाखूनों से
खरोंची जा सकती थी संवेदनाएं,
और तुम हो कि
परित्यक्त शैलों की तरह
पड़े रहे बेखबर ।

युद्ध और शांति के बीच
एक दुनिया और भी है
जो घुटती रही है बार-बार
और खोजती रही है
अपने अस्तित्व की वजह हमेशा से....

युद्ध थोपे जाते हैं
अहंकार के कारण
मानवीय कुचली जाति है
संकुचित मानसिकता के कारण

इस बीच बैचेनी है कि
क्या अपने हक की लड़ाई
इतनी ख़तरनाक है ?
या सच यह है देश की छाती में बैठा है
चाण्डाल योग ?
- कमलेश वर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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