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तुम निश्चल प्रेम गंग बहाना

                
                                                         
                            तुम निश्चल प्रेम गंग बहाना
                                                                 
                            

आँखों के दो पैमानों में
रुद्र गीत के अफ़सानों में
मोती अश्रु-गीत से चुन लाना
नहर झरनों नदियों में
प्रचंड वेग वाहिनी में
हर नय्या तीव्र वेग बहाना

अन्तःकरिणिय कर्मों में
लुप्त होते धर्मों में
धाम राम सा ढूंढ आना
जंगल विरान घाटियों में
क्षुब्ध होते श्रोतों में
तुम शांति पताका फहराना

विस्तृत समर के अंध कुंड में
भीड़ वाले लोक झुंड में
तुम विश्वास रूपी देव रचाना
इर्ष्या द्वेष कलयुग में
भ्रमित इस लोक जुग में
तुम आत्मश्रद्धा का बोध कराना

उड़ती पतंग की तंग डोर में
पनपी पड़ी उस अचेत होड़ में
तुम निश्चल प्रेम गंग बहाना
खोह मोह उस तम में
रावण रूपी अहम में
तुम राम से निस्तार कराना
-कमलेश रंजन
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