आज हर तरफ जन सैलाब सा उमड़ा है
जिधर देखो मुकुलित इक गुलाब सा उभरा है
फिर से पोषित होती पारितोषिक होती हकों की लड़ाई
पुरानी किताबों से रूह-ए-इन्कलाब सा उमड़ा है
आज हर तरफ जन सैलाब सा उमड़ा है
पुरानी पड़ी चादर से चुभता धागा उधड़ा है
दिनों बाद नयी किश्तियॉं बाजार में हैं आईं
नामंजूरी सा सबब बेहिसाब सा उमड़ा है
आज हर तरफ जन सैलाब सा उमड़ा है
रंगमंचीय किरदारों पर सुरूर नया सा उतरा है
पुख़्ता गुंजित होंगी आवाम-ए-आवाज है उठाई
अर्जुन का बाण आज़ तरकस पर उतरा है
आज हर तरफ जन सैलाब सा उमड़ा है
मौन वक़्त आज आसमानी गर्जनाओं सा उभरा है
कुसमुसाई जकड़न से खिलाफत है मांगती रिहाई
इस खेमें इस रथ पर इक साकेत सा उतरा है
आज फ़िर इसलिए ये सैलाब सा उमड़ा है
-कमलेश रंजन
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