लफ्जों की कतार बनाकर, आज इस साहित्य समर में खो जाऊँ
कुछ बतलाती सहलाती अथाह रचना-रचित संसार सजाउँ
उभरते उछलते पद छंदो को यूँ पिरोकर फिर
बन पड़ी उस गीत गुंजन से मेँ भी गुंजित हो जाऊँ |
बिम्ब वाली वो ओढनी लिए मैं फिर गुंजन गान गाऊं
आहिस्ते से फिर धीरे धीरे पद के पैर थिरकाऊं
कुछ पंक्तियों को देकर अलंकारों के और स्वर
अनंत अस्तित्व लिए आज सृजन का अनवरत बटोही बन जाऊँ |
गान सृजन के उस हृदयंगम को पल्लवित पंख लगाऊँ
सृजन के उस नव अस्तित्व को खोजू और पा जाऊँ
तन मन में रम रमाकर
त्वरीत विलिन हो यूँ
वांग्मय-ब्रम्हाण्ड में आन बसु नित छा जाऊँ |
अनंत अस्तित्व लिए आज सृजन का अनवरत बटोही बन जाऊँ,
अनवरत बटोही बन जाऊँ ||
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