मैं गीत शिखा से उठने बाली अग्नि ज्योति की ज्वाला हूॅं ।
मैं शिव शंकर के कंठ बिराजे वो अदभुत सी हाला हूॅं ।
निज चेतन का चिन्तन लेकर मैं मौन हमेशा रहता हूॅं -
निर्बल न समझना सखे मुझे मैं त्रिपुरारी का भाला हूॅं ।
-कमल" बरेलवी
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