ऐ मनवा अब क्या खेलें खेल
सांस-सांस में पीर बसी है,
कर ले प्रभु से मेल ।
ऐ मनवा – – – – – –
धूमिल हो गयी मन की नगरी,
जीवन लगता जेल।
जीवन नैया टूट चुकी है,
छूटी जाए रेल।
ऐ मनवा – – – – – –
अपने सारे हुए पराए,
अब क्या होगा मेल ।
जीवन रूपी बाती जल गयी,
नहीं बचा है तेल ।
ऐ मनवा – – – – – –
जीवन जड़ तो सूख चुकी है,
अब क्या फूले बेल ।
जाना तो हर हाल में होगा,
फिर क्यों ठेलम-ठेल ।
ऐ मनवा – – – – – –
दुनियादारी से मैं हारा,
हो गया जग में फेल ।
"तन्हा" जग में काम नहीं अब
छोड़ जगत के खेल ।
ऐ मनवा---------------------
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