आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तन्हा भजन

                
                                                         
                            ऐ मनवा अब क्या खेलें खेल
                                                                 
                            
सांस-सांस में पीर बसी है,
कर ले प्रभु से मेल ।
ऐ मनवा – – – – – –

धूमिल हो गयी मन की नगरी,
जीवन लगता जेल।
जीवन नैया टूट चुकी है,
छूटी जाए रेल।
ऐ मनवा – – – – – –

अपने सारे हुए पराए,
अब क्या होगा मेल ।
जीवन रूपी बाती जल गयी,
नहीं बचा है तेल ।
ऐ मनवा – – – – – –

जीवन जड़ तो सूख चुकी है,
अब क्या फूले बेल ।
जाना तो हर हाल में होगा,
फिर क्यों ठेलम-ठेल ।
ऐ मनवा – – – – – –

दुनियादारी से मैं हारा,
हो गया जग में फेल ।
"तन्हा" जग में काम नहीं अब
छोड़ जगत के खेल ।
ऐ मनवा---------------------
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
12 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर