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कहाँ तो तय था आशियाना मेरा

                
                                                         
                            यूँ ही मैं ख़ामोश नहीं,
                                                                 
                            
देख रहा हूँ तुझको।
देख रहा हूँ रीत तेरी,
देख रहा हूँ रिवाज़ तेरे।
तेरे बनाए रस्मों-रिवाज़ों ने,
दफ़्न कर दिए कितनों के ख़्वाब।

कहाँ तो तय था आशियाना मेरा,
कहाँ लाकर खड़ा कर दिया।
लिखता अगर सच तेरे ख़िलाफ़,
घर से ही बेदख़ल कर दिया जाता।

मुझको दौड़ाया उस दौड़ में,
जिसका मुझे कोई शौक न था।
तेरी बनाई इस अंधी होड़ में,
ख़ुद से ही दूर होता गया।
तबाह भी हुआ, बिखर भी गया,
तुझको ख़ुश करते-करते।

क्या फ़ायदा इस खुले आसमाँ का,
जब मैं तेरी बेड़ियों में कैद हूँ।
पंख तो मेरे सलामत थे,
मगर हौसले बाँध दिए गए।
उड़ भी जाता तो मारा जाता,
इसलिए हिस्सा बन गया,
तेरी अंधी होड़ का,
तेरे इस दस्तूर का।

काश, अगर तू सुन पाता,
मेरे ज़ख़्मों को देख पाता।
लबों ने ख़ामोशी ओढ़ ली,
दिल हर पल तुझे पुकारता रहा।
काश, तू समझ पाता,
अल्फ़ाज़ से पहले दिल की भाषा।

मैं थक गया हूँ, मैं हार गया हूँ,
तेरी बनाई इन बेड़ियों से।
देखा है मैंने बाज़ारों में,
बिकते हैं झूठ हज़ारों में।
ख़ुद को साबित करते-करते,
दम तोड़ देता है सच दरबारों में।
तू ही बता, मेरे समाज,
कैसे मान लूँ तेरे रिवाज़?

जहाँ सच ही दम तोड़ देता हो,
वहाँ कैसे झुकाऊँ अपना सिर?
—कमल सिंह डिण्डोर
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3 महीने पहले

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