कब तक हम पे तुम यूँ सितम ढ़हाया करोगे ,
ख़्वाबों ने भी आकर हमसे मिलते नहीं हो,
बताओं आखिर हमे कब तक तड़पाया करोगे ।
*के,के,कौशल*,
इन्दौर, मध्यप्रदेश
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X