पलकें जो बंद हुईं,
उजाला छा गया।
परदे के उस पार,
अब दिखने लगा।
वर्षोँ से जमी बर्फ,
आँसू बन बह चली।
दिल पूरा भीग गया,
दर्द धुआँ बन गया।
जल गया भ्रम,
कुछ अब न रहा।
राख भी न बचा,
सब हवा ले गया।
—कमल किशोर झा
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