चलो, आज छुपकर देखते हैं,
कौन ढूँढता है मुझे,
कौन मेरी खामोशी को पढ़ता है,
कौन महसूस करता है कमी मेरी।
न कोई आवाज़ दूँगा,
न कोई खबर करूँगा,
बस यूँ ही कहीं दूर जाकर
थोड़ा सा इंतज़ार करूँगा।
पता तो चले—
मेरे होने की किसे परवाह है,
किसकी आँखें मुझे तलाशेंगी,
किसके दिल में मेरी जगह है।
जो रोज़ कहते हैं—
“तुम्हारे बिना नहीं रह सकते,”
देखूँ तो सही,
ये बात कितनी सच्ची है।
चलो, आज खुद को छुपा लेते हैं,
रिश्तों की हकीकत ज़रा देख आते हैं…
कौन सच में अपना है,
और कौन सिर्फ़ अपना कहलाता है।
—कमल किशोर झा
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