मैंने जिंदगी में जिंदगी को खोया है
,एक ज़िंदा लाश की तरह इस बोझ को ढोया है।
साँसें तो चलती रहीं पर धड़कनें खामोश थीं
,मैंने हर मोड़ पर अपने ही वजूद को खोया है।
मैंने दर्द में भी दर्द सहा है,
आँसुओं का सैलाब आँखों से चुपचाप बहा है।
जब ज़माने ने पूछा मेरी इस ख़ामोशी का सबब,
मैंने हँसकर कह दिया कि सब कुछ सही रहा है।
मैंने तमन्नाओं में भी कुछ रोया है,
ख़्वाबों की ज़मीन पर बस कांटों को बोया है।
जिस उम्मीद को सींचा था मैंने अपनी रातों से,
उसी उम्मीद ने मुझे रातों-रात जगाकर रुलाया है।
मैंने जिंदगी की हर मिठास में फीकेपन को देखा है
,खुशियों की हर महफ़िल में अकेलेपन को देखा है।
लोग ढूँढते रहे मेरे चेहरे पर मुस्कान की वजह,
पर मैंने उस हँसी के पीछे छिपे रीतेपन को देखा है।
मैंने किस्मत के हर तराजू में किस्मत को तोला है,
हर शिकवे को अपनी ही तन्हाई में बोला है।
जब भी माँगा तकदीर से थोड़ा सा भी सुकूँ
बदले में इस नसीब ने ज़हर का प्याला ही घोला है।
चल रहा हूँ राहों पर अब बिना किसी चाह के,
गुज़र रहे हैं दिन बस एक ठंडी आह के।
अब न कोई शिकायत है, न कोई मलाल है
ज़िंदगी तो बस एक थका हुआ सवाल है।
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