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दस्तूर ओर सुकून

                
                                                         
                            हर जलते चिराग के मुक़द्दर में कोई नसीहत नहीं होती,
                                                                 
                            
बुझते हुए दीयों की भी ज़माने में कोई शिकायत नहीं होती।
हर टूटे हुए रिश्ते के पीछे कोई कश्मकश हो यह लाज़मी तो नहीं,
कुछ खामोश विदाओं में नफ़रत की कोई गुंजाइश नहीं होती।
हर ज़ख्म से भरी आँखों में कोई रवानी हो यह ज़रूरी नहीं,
हर बहते हुए आंसू की कोई अपनी कहानी हो यह ज़रूरी नहीं।
कुछ दर्द सीने में पत्थर बनकर ठहर जाते हैं उम्र भर,
हर बिखरे हुए दिल की कोई दास्तान-ए-ज़ुबानी हो यह ज़रूरी नहीं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
52 मिनट पहले

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