क्या वक्त था वो एक जुनून का
लहजे में बहते उस रस-ओ-रंग का।
बातचीत में भी एक आग थी,
हर सांस में छिड़ी एक जंग थी।
आंधियां भी जब आकर टकराती थीं,
वो वक्त के तेवर और जुनून बता जाती थीं।
पर थमता कहाँ था यह तूफानी मंज़र,
जब ठाठ मार रहा था दिल का समंदर,
उस समंदर में भी एक अपना जुनून था,
तूफानों को पीने का एक अलग ही सकून था।
वक्त का भी वक्त से एक और जुनून था,
लम्हों की दौड़ में छिपा एक नया फितूर था।
थमने का नाम न लेती थी ये जिंदगी,
थकने को तैयार न थी यह बंदगी।
तन के बहते हर तेज से वो और जुनून था,
रगों में दौड़ते लहू का वो गजब का सुरूर था।
हार को भी अपनी जीत बना लेते थे,
कांटों के साए में भी मुस्कुरा लेते थे।
और क्या बताऊं, बयां कैसे करूं वो समां,
कागज के हर शब्द से टपकता वो और जुनून था।
कलम जब चलती थी, तो इतिहास लिखती थी,
स्याही की हर बूंद में एक जिद सी दिखती
थी।
वो दौर नहीं, वो एक मुकम्मल दास्तान थी,
जहाँ बंदिशें छोटी और अपनी उड़ान आसमान थी।
अब भी जब याद आता है वो जज्बा पुराना,
दिल चीख उठता है—क्या वक्त था वो जुनून का!
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