तेरी जुदाई सा कोई ख़सारा ना हुआ
मुझे इश्क़ फिर दुबारा ना हुआ
तमाम शामें जलती रही ग़में-ए-हिज्र में
फिर भी ख़ाक वज़ूद हमारा ना हुआ
यू तो दिल को किया है पथर मैंने
फिर भी ‘सुभी ‘ तेरा गुजारा ना हुआ ॥
-सुभी
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