वेसे तुम्हें मिल जाए जो भी खुशी हो तुम्हारी,
तुम्हारी खुशी हम न हुए तो क्या हुआ ।
यू तो सब एक दिन बदल ही जाते है,
फिर तुमसे शिकायत कैसी ।
यह जो बात बात पर रूठते हों तुम मुझसे,
हम पत्थर तो नहीं, बार बार भूले हुकुम तुम्हारा ।
मान जाओ अब तुम यह मुमकिन तो नहीं,
खोया क्या है मैंने जो ठहरना ही नहीं चाहता था कभी ।
एक उम्र मांग लाते खुदा से हम भी तुम्हारी ख़ातिर,
फिर सोचते हैं कि दे दे क्या तुम्हें बेनमाज़ी को जाना।
कोशिश बहुत कि हमने तेरे हो जाने कि,
हर बार ठुकरा दिए गए हम नामुमकिन से सवालों से।
उम्र मांग ले, फिर तेरे गुलाम हो जाए, और क्या क्या करे अब हम तेरे दिल कि किताब मे रहने को ।
चलो तुम ही कहो,
हार जाए या बर्बाद हो जाए,
तुम ही कहो अब क्या ही कर जाए।
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