पसंद नहीं है मुझे जी हजूरी,
मैं हूं स्वाभिमान नारी ।
अबला नहीं हूं,
मैं हूं आधुनिक नारी ।
हारी नहीं हूं मैं पुरुष प्रधान जगत से,
जीती हूं खुद्दारी से ।
मैं हूं स्वाभिमान नारी,
जितना तपती हूं ।
उतना निखरती हूं,
जिद्दी हूं अपने सपनों को पूरा करने में ।
हारती नहीं किसी संघर्ष से,
जीत जाती हूं मैं ।
उन अभिमानी लोगों से,
उठाते हैं जो अंगुली मुझ पर ।
बह जाते हैं, वह अपनी अकड़ से,
मर्यादा में रही मैं हर हाल में ।
मैं हूं अपने सपनों के,
महल के मिसाल में ।
हूं नारी में स्वाभिमानी,
इस आधुनिक काल में ।।
- उषा मेहरा टोंक
राजस्थान
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X