आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

तुम धरती से हो जाओ!

                
                                                         
                            तुम धरती से हो जाओ!
                                                                 
                            

तुम धरती से हो जाओ
या फिर आसमान से,
नहीं तो सागर से हो जाओ
पर अपनी ही पहचान से
अपने ही रंग में रंग जाओ।
धरती बनकर धीरज रखना
बीजों में विश्वास जगाना,
नयी खाद, नयी ऊर्जा देना
सागर सी गहराई रखना
लहरों सा आगे बढ़ते जाना। आसमान बन तुम
सपनों को दे देना विस्तार
तुम धरती से हो जाओ
या फिर आसमान से,
नहीं तो सागर से हो जाओ।
पर अपनी ही पहचान से
अपने ही रंग में रंग जाओ।
राह कठिन हो, पांव थके तो,
हौसलों को सोने मत देना
टूटे पलों को गीत बनाकर,
मन को फिर से रोने मत देना
जीवन अपना गीत स्वयं हो
पहचान दूसरे की उधार न लेना।
तुम धरती से हो जाओ
या फिर आसमान से
नहीं तो सागर से हो जाओ।
मिट्टी में हो या फिर जल में हो
या फिर गगन की छांव में हो
खुद को पाना ही जीवन है
खुद को खोना असली धोखा है।
जहां खड़े हो, वहीं खिला दो फूल
अपनी ताकत से, नये विश्वास से।
तुम धरती से हो जाओ
या फिर आसमान से,
नहीं तो सागर से हो जाओ
पर अपनी ही पहचान से
अपने ही रंग में रंग जाओ।
-ज्योति वर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर