ए बारिश!
तू मुझे धैर्य रखना सिखा गई,
यह बारिश मुझे इंतज़ार करना सिखा गई।
आती हो तो ठहरो ज़रा,
एक-दो पहर मेरे आँगन में।
मैं अभी भी थोड़ी नादान हूँ,
तेरी हर बूँद के अर्थ से अनजान हूँ।
लगता है,
आज तुम केवल बरसने नहीं,
इस जग को आईना दिखाने आई हो।
बदलते मौसम की भाषा में
कोई अनकहा संदेश सुनाने आई हो।
प्रकृति को जब क़रीब से देखा,
तो प्रश्नों की बौछार होने लगी।
मन की धरती पर
अनगिनत शंकाएँ अंकुरित होने लगीं।
सुनो बारिश!
क्या तुम सचमुच चेतावनी बनकर आई हो?
वह रिमझिम-सी मुस्कुराती बरसात
अब कहाँ खो गई?
अब जब भी आती हो,
तुम्हारी हर बूँद में आक्रोश छलकता है।
बरसती हो तो कहीं
नदियाँ अपने किनारे भूल जाती हैं,
तो कहीं धरती की प्यास
आकाश तक पुकारती रह जाती है।
यह कैसा संतुलन है?
यह कैसा विकास है?
कहीं बस्तियाँ जलसमाधि लेती हैं,
तो कहीं खेत वर्षा की एक बूँद को तरस जाते हैं।
फिर लगा,
शायद तुम कह रही हो—
“मैं प्रलय नहीं,
तुम्हारे कर्मों का आईना हूँ।
जो तुमने प्रकृति के साथ किया,
उसी का उत्तर बनकर आई हूँ।”
मनुष्य के स्वार्थ में
जब वृक्ष अंधाधुंध काटे गए,
नदियों के मार्ग रोके गए,
धरती का सीना छलनी किया गया,
तभी तो ऋतुओं का संतुलन भी
धीरे-धीरे बिखर गया।
हे मानव!
अपने ही हाथों लिखे विनाश का यह अध्याय
क्या तुझे अब भी दिखाई नहीं देता?
यह रूप जो तेरा है,
वह शिव के रुद्र तांडव-सा प्रतीत होता है।
तेरे मार्गों पर हुए अतिक्रमण का
यही तो प्रतिरूप है।
तू चीख-चीखकर चेतावनी देती है,
फिर भी मनुष्य सुनना नहीं चाहता।
प्रकृति बार-बार समझाती है,
फिर भी वह समझना नहीं चाहता।
फिर भी, ए बारिश!
तू मुझे धैर्य रखना सिखा गई,
यह बारिश मुझे इंतज़ार करना सिखा गई—
उस दिन का इंतज़ार,
जब मनुष्य फिर से
प्रकृति का मित्र कहलाएगा,
और तेरी हर बूँद
फिर जीवन का उत्सव बन जाएगी।
- ज्योति बरनवाल
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