फागुन की बयार चली, रंगों की आई टोली,
मन में उमंगें जाग उठीं, देखो आई होली।
गाँव के चौपालों में फिर ढोलक बाजे मस्त,
गली-गली में घूम रहे गुलाल सजे हर पथ।
बचपन की वो टोली फिर से, दौड़ी सरपट आई,
अबीर-मल्हारों से गुंजित धरती भी मुस्काई।
माँ के हाथों गुझिया छनती, घी की मीठी खुशबू,
बूढ़े-बच्चे संग हँसते, छनक रही हर रूठू।
रंग-बिरंगे कपड़े पहने, बैल भी करते शोभा,
हर आँगन में गाए जाते, होरी के मीठे जोधा।
गाँव की गलियाँ, कुएँ-किनारे, सब पर रंग चढ़ा,
माटी तक भीग गई देखो, सतरंगी ये गगन बना।
संध्या ढली तो होलिका जलने लगी ऊँची,
मन के सारे मैल जले, लौ उठी खूब कूँची।
भोर हुई तो रंग उतारे, पर खुशबू रह जाती,
गाँव की होली हर बरस, फिर यादों में आ जाती।
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