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भगत सिंह

                
                                                         
                            भोर हुई जागे पंछी, गति तेज थी उनके पैरों की, जैसे किसी को लेने जाना था ||१||
                                                                 
                            
किलकारी गूंजी, ध्वनिकोष के शब्द विराजे, हुआ अवतरित एक अंश, जैसे शून्य भी अनंत को साधे
लिखी वेदों की सिद्ध हुई, एक क्रांतिकारी को लेने जाना था,||२||
हाँ 28 सितंबर को ही पुण्यतिथि थी
मगर भूल गए तुम हम कि फूलों से तस्वीर को उनकी सजना था
मगर भगत सिंह को सुनाने के लिए उनके किरदार में लौटना होगा, शब्दों को वाणी को संग पूर्ण विराम के घोंटना होगा
अतः सुनो गौर से मैं भगत सिंह के किरदार मेंआता हूँ सन् 1931 का था भारत कैसा,कुछ जरा अवगत कराता हूँ,
जब झंडा देखता था माँ भारत का मुझे याद उसी की आती थी। हवा मन की बड़ी बेताब थी उसकी और बढ़ी जाती थी
बचपन बीता जवान हुए, समकालीन भारत मानो बेघर हो ही गया था,
माँ भारती को देख कर बेबस भगत सिंह का बचपन सो ही गया था।
अब जाग कर अंग्रेजों को झुकाना था, बनी योजना एक काम करो, संदेशा भेजो यमराज को कोर्ट को बम से उड़ाना था।
ये सोच के आगे बढ़े भगत सिंह
पर आज शायद ही कोई आगे बढ़ता होगा,
भारत माँ के लिए शायद ही कोई लड़ता होगा।
मगर चार दोस्त हुए तैयार जो भारत से करते थे प्यार,
बम बनाने को वे उत्सुक थे
दे सलामी तिरंगे को वे भारत के सम्मुख थे। बारूद खरीदी, बम के खोल लिये ,एक रखा भारत के नाम का, दूसरा रखा दूसरे काम का,
शंख बजा मानो ध्वनि युद्ध की,
बस आवाज जय हिंद की बड़ी क्रुद्ध थी।
हाँ बड़ा नाम नहीं मगर बहरे भी सुन बैठे थे तानी छाती लख वीरों जैसे एकले ऐंठे थे,
आखिर उन्होंने बम फोड़ दिया,
धुंआ उठा संग चिंगारी,
डरे सहमे भागे वो शिकारी,
वो शिकारी जो कर रहे थे 200 वर्षों से अत्याचार और भारत ने अतिथि समझ
उन्हें खूब दिया प्यार।
मगर मन में डर तो था उनके मन में
अंग्रेज दो बातों से
एक मुझे स्वराज चाहिए
दूसरा वो भी आज चाहिए।

तत्पश्चात कोर्ट के द्वारा अंग्रेजों पर जुल्म के आरोप में उन्हें फाँसी की सुनाई जाती है। उनकी माँ उनसे मिलने आती है, रोने लगती है। स्वाभाविक है। मगर स्वाभाविक नहीं थे भगत सिंह वो कहते हैं, माँ तेरा बेटा बहादुरी की और है, शहीदी पर ऐसे भी कोई रोता है।

माँ
तुझे रोना शोभा नहीं देता,
खुदा हर किसी को ऐसा मौका नहीं देता।
खैर
दुविधा ये है कि भगत सिंह तो हर कोई चाहता है मगर अपने घर से क्यूं नहीं भेजते
तुम गर्व से भारत को माता तो कहते हो, मगर किसी ओर पर क्यूँ हो थोपते
अरे हृदय विशाल है तो अपना लो उन्हें
ओर हाँ 28 सितंबर हर वर्ष आता है इस बार भी आयेगा, हो लाज लोक जरा सी मन में तो दो फूल चढ़ा देना उन्हें,

 
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2 महीने पहले

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