एक दिन आँखें थोड़ी-सी नम थीं,
चेहरे पर हँसी भी कुछ कम थी।
ऑफिस के एक साथी ने पास आकर पूछा—
“क्या हुआ? सब ठीक है?”
हँसकर मैंने कहा—
“कुछ नहीं… ठीक हूँ।”
जबकि ठीक नहीं था कुछ भी,
परेशानी थी घर की कुछ बातों की,
ऑफिस की राजनीति की,
माँ-पापा की तकलीफ़ों की।
लेकिन जानती थी…
बता कर, जता कर भी,
कहाँ कुछ हो पाता है।
क्या समझा पाती उसे
कि मन में कितनी उलझनें हैं,
कितने सवाल हैं,
कितनी अनकही बातें हैं।
लेकिन इतना सब
कैसे कह पाते?
इसलिए “ठीक हूँ” कहकर
खुद को ही समझाते हैं,
और उस तकलीफ़ को
फिर से दोहराने से बच जाते हैं।
शायद इसीलिए
हम ठीक होने का दिखावा करते हैं…
क्योंकि हँसते चेहरों का साथ देने वाले
बहुत मिल जाते हैं,
लेकिन जब आँखें नम हों,
तो अक्सर हम अपने आँसुओं के साथ
अकेले ही रह जाते हैं।
ये दुनिया भी बस
खुशियों में गले लगाती है,
और तकलीफ़ों में अक्सर
भुला जाती है।
जब अनुभव इतना गहरा हो जाता है,
तब समझ में ये आता है—
दर्द दिखाने से
दुनिया की नज़रों में
कमज़ोर हो जाते हैं।
शायद इसीलिए
हम ठीक होने का दिखावा करते हैं…
मुस्कुराते हैं,
“कुछ नहीं हुआ” कहते हैं,
और अपने भीतर के शोर को
खुद ही चुप कराते हैं।
शायद इसीलिए
हम ठीक होने का दिखावा करते हैं…
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