नीले गगन को बदल डालो,
तमाम रंग उनमें भर डालो ।
धरती बदली, पर्वत बदला,
बदला मनुष्य ने अपने हाथों के बल ।
प्रकृति को बलहीन, अक्षम मानना,
मनुष्य के भविष्य का अंत करना ।
रोष और जोश की इस निरंतरता से,
हार रहे हैं हम प्रकृति के प्रकोप से ।
हे मनुष्य ! अब तो जाग जा,
मत रह अपने अहंकार में लीन ।
चलें हम प्रकृति की ओर,
क्योंकि टिका है हमारा जीवन मात्र प्रकृति के बल पर ।
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