कविता: मन की बातें
शोर करती गाड़ियों के बीच
हम करते चले
अपनी मन की बातें l
न तो मैंने कुछ सुना
न वो कुछ सुन पाए
फिर भी हो रही थीं बातें l
समझ न आई,
वो अधूरी बातें ।
शब्द पिरोए मुकरी बनीं ज्यों,
वो थीं मन की बातें।
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