सीख दी तुमने महा गणपति,
माता- पिता ही हैं जगत,
यही परिक्रमा की नीति ।
धार्मिक बोध की पावन चाहत,
तुम ही हो विघ्नेश्वर,
तुम ही हो पूर्णता की मूरत ।
ज्ञान धारक, मूषक वाहक,
ऊँच-नीच के तुम भंजक।
दर्प मिटाकर मोदक सम बाँटे समता,
हरती जग की सारी विकलता ।
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