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कविता:गणपति

                
                                                         
                            सीख दी तुमने महा गणपति,
                                                                 
                            
माता- पिता ही हैं जगत,
यही परिक्रमा की नीति ।

धार्मिक बोध की पावन चाहत,
तुम ही हो विघ्नेश्वर,
तुम ही हो पूर्णता की मूरत ।

ज्ञान धारक, मूषक वाहक,
ऊँच-नीच के तुम भंजक।

दर्प मिटाकर मोदक सम बाँटे समता,
हरती जग की सारी विकलता ।
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6 घंटे पहले

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