कविता: माँ या बालक की भक्ति
संध्या छाई तो घर के आँगन में,
दीप की ज्वाला चहूँ ओर चमके l
भज गोविंदम् भज गोविंदम्,
सुमधुर स्वर गूंजे हर श्रुति में l
शाम की क्रीड़ा को छोड़ सदा एक बालक,
हर दिन मेरी माँ के संग गाता भगवद् गीता के पद l
मोर - मुकुट धारक को आँखों के समक्ष,
उसने देखा नटखट वृंदावन का गोविंद l
अकस्मात् एक दिवस खुला द्वार प्रयास बिना,
बालक बोला, “अम्मा ! आपका कृष्ण- मुरारी कमरे में l”
तत्क्षण पड़ा अदृश्य प्रहार पिता की जंघा पर,
कराहकर पूछा उन्होंने, “किसने मारा मेरी जंघा पर ?”
शून्य की ओर उँगली उठाकर बालक बोला -
“अरे, वही अम्मा का कृष्ण- मुरारी।”
स्तब्ध रह गए सब, जब हुई दिव्य अनुभूति,
कृष्ण का सामीप्य मिला उस निष्कलंक बालक को,
किंतु तड़पती माता को दिया न दर्शन उसने,
जैसे तरसाया था पुजारिन मीरा को।
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