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शिक्षा नहीं व्यापार

                
                                                         
                            शिक्षा नहीं व्यापार,
                                                                 
                            
कैसा यह दरबार?
प्रश्न है खड़ा,
चुप है अख़बार।

कलम गई हार,
कुर्सी दमदार।
सपने गए टूट
कौन ज़िम्मेदार?

बिक गया विचार,
बच गया प्रचार।
ईमान सिर झुकाए,
जीता भ्रष्टाचार।

अपराध अपार,
मुजरिम फ़रार।
सवाल जो उठाए,
वही गुनहगार।

जो बोले, गिरफ़्तार।
जो चुप, समझदार।
बोलना भी जुर्म ,
कैसा लोकतंत्र यार?

देख रहा संसार,
न्याय की पुकार।
कब तक जीतेगा,
झूठ का बाज़ार?

कानून शर्मसार,
लूट बरक़रार
कब जागोगे,
देश के पहरेदार?
- जया जायसवाल
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14 घंटे पहले

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