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बहुत कुछ भूल चुके हैं हम और खुद को खो चुके हैं हम

                
                                                         
                            हाँ बेशक कहीं बिछड़ कर
                                                                 
                            
दूर हो चुके हैं हम
पता ही नही है हमें
कहाँ जा चुके हैं हम
कहीं तो किसी के लिए
खुद को ही भूल चुके हैं हम
ना जाने किधर आ चुके हैं हम

अब किसी रोज़ इस मतलबी
दुनिया के इस काले बाजार मे
खुद को खड़े पाके हो गये है हम दंग
पर इसका अर्थ ये हरगिज़ भी नहीं है
कि खुद को ही नीलाम कर देंगे हम

पता नही किसको ढूंढने को
अपने घर से निकले थे हम
बेकार मे यहाँ-वहाँ भटक रहे थे हम
दूसरों की बुराइयों की ख़ोज मे
खुद को ही नफ़रतों के हाथों कही
खुद को ही खो चुके हैं हम
और ऐसे अब इंसानियत को
पूरी तरह से गंवा चुके हैं हम...
- जतिन कुमार
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3 वर्ष पहले

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