कुरुक्षेत्र की भूमि मे
महाभारत का युद्ध हुआ
इस महासंग्राम के युद्ध मे
कई महा-रथियों का विनाश हुआ
रण-भूमि के क्षेत्र मे
कई पराक्रमी योद्धाओं का नाम हुआ
कौरवों और पांडवो के बीच मे
कर्ण और श्री कृष्ण का चयन हुआ
धर्म और अधर्म के युद्ध मे
एक शूरवीर का छल से अन्त हुआ
जन्म के वक़्त कुंती माता से दूर होने का
कर्ण को बहुत गहरा दुख का अनुभव हुआ
निम्न-जाति के कारण कर्ण को
शिक्षा से वंचित रहने का कष्ट हुआ
झूठ बोलकर शिक्षा प्राप्त करी
इस झूठ के कारण धर्म-सकट की घड़ी मे
विद्या भूलने का एक भारी अभीशाप मिला
अपने ही अनुजो द्वारा कर्ण का शोषण हुआ
आर्य समाज मे हर बार की तरह उसका बहिष्कार हुआ
इस प्रकार कर्ण के हर अधिकारों का हनन हुआ
फिर कर्ण को दुर्योधन की मित्रता का साथ मिला
ऐसे अंगराज कर्ण को अपना खोया हुआ सम्मान मिला
द्रोपदी के विवाह-स्वयंवर मे कर्ण को
द्रोपदी की वजह से सूतपुत्र होने का अपमान मिला
द्रोपदी के शब्दों से कर्ण के आत्मसम्मान का खंडन हुआ
श्री कृष्ण द्वारा कर्ण को अपने जीवन की सच्चाई का बोध हुआ
तब जाके सुतपुत्र नही सूर्यपुत्र होने का कर्ण को गर्व हुआ
दुर्योधन की मित्रता की डोर से कर्ण मित्र बना रहा
अपने वचनों के खातिर कर्ण ने कवच व कुंडल का इंद्र को दान दिया
कुंती माता के पांचों पुत्रों का जीवनदान का वचन दिया
ऐसे अंगराज कर्ण को दानवीर कर्ण का नाम मिला
कर्ण ने अपनी विजय की सभी संभावनाओं का त्याग किया
रण-भूमि मे कर्ण - अर्जुन के युद्ध का आगमन हुआ
कर्ण - अर्जुन के बाणों से चारो-ओर हाहाकार हुआ
कर्ण - अर्जुन युद्ध से कुरुक्षेत्र मे विध्वंस का निर्माण हुआ
श्री कृष्ण की माया से अर्जुन को कर्ण से बचा लिया
श्री कृष्ण के छल-कपट की अनोकी युक्ति से
कर्ण के रथ का पहिया भूमि पर फसा दिया
ऐसे अवसर का लाभ लेकर कर्ण का अर्जुन ने वध किया
इस प्रकार कर्ण ने अपनी मित्रता के लिए अपना जीवन का बलिदान किया
:- जतिन कुमार
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