आँखे मेरी तरश जाती थी
किसी को देखने के लिए
अरे ये आँखे क्यों तरश जाती है
किसी को बेवजह देखने के लिए
अगर गलती से वो सामने आ जाये
तो नज़रे क्यों झुक जाती थी
उससे निगाहेँ मिलाने के लिए
अपने इस दिल का मै क्या करू
क्यों उसको देखकर धड़क उठता था
क्यों उसके लिए इतना तड़पता था
क्यों उसके लिए खुश हुआ करता था
फिर एक दिन वो वक़्त भी आया
जब उससे कुछ बात करने का अवसर भी आया
परन्तु अपने इस शर्मिंले स्वभाव के कारण
उसके आगे कुछ भी हम बोल भी ना पाए
और वहाँ से हम तुरन्त घर चले आए
फिर एक दिन ऐसा मंजर भी मेरे सामने आया
जब उसका हाँथ किसी ओर के हाँथ मे मैंने पाया
उसको किसी ओर के साथ खड़ा देखकर
ना तो हम मुस्कुरा पाए और ना हम रो पाए
बस अपनी आँखो मे ग़मो के आँशु समेट कर
उसकी जिंदगी से अलविदा कहकर चले आए
:- जतिन कुमार
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