ना जाने ये हवाओ मे कैसी मदहोशी छाई है
अब तो आज-कल मुझको नीँद भी कम आई है
वक़्त-बेवक़्त क्यों उठती है मेरे जेहन ये आवाज़
तुमको खोने के डर से दिल मे ख़ामोशी क्यों छाई है
पता नहीं दिल की हर बातें ज़ुबान पर क्यों आई है
तुमको देखकर तो मेरी ज़िन्दगी भी बहुत मुस्कुराई है
ये तेरी दोस्ती की इन्तहा है या मेरी चाहत का कसूर
अब हर सूरत मे सिर्फ तेरी ही सूरत नज़र आई है
कैसे बताओ तुमको अपने दिल की आरजू
लगता है आज मेरी सामत मेरे गले पड़ने आई है
पहले कभी ऐसा नहीं हुआ करता था मैं
ना जाने कौन-सी रंगत मुझ पर अब समाई है
- जतिन कुमार
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