बेवजह सब से मिलकर अपने चेहरे की मायूसी को क्यों छुपा रही हो
अपनी दिखावटी हसीं के पीछे कौन-सी तकलीफों को दबा रही हो
अक्सर तुम्हारी आँखों के नीचे थमे रहते हैं ग़मों के बादल
फिर क्यों इन बादलों को किस गैर के लिए इतना बरसा रही हो
हर शख्स को ज़िन्दगी मे किसी ना किसी के साथ की आवश्यकता होती ही है
ऐसे मे तन्हाइयों की चार दीवारियों मे खुद को क्यों कैद कर रही हो
हम तो तुम्हारे अच्छे के लिए बैठे थे कि भूल ही जाओगे उस शख्स को
पर तुम अब भी उस शख्स की यादों को सोचकर तड़प रही हो
क्यों उस शख्स के बेवफाई के सितमों को खामोशी से घुट-घुटकर जीने की कोशिश कर रही हो
हर वक़्त उसके लौटने के इंतजार मे अपनी जिंदगी को बर्बाद करने मे लगी रही हो
अब क्यों उस शख्स के काले साये मे खुद को डुबाती जा रही हो
अब क्यों उसके बिछड़ने को स्वीकार नही कर रही हो
- जतिन कुमार
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X