एक खग वेग भर रहा गगन में,
मंजिल की रफ्तार में,
एक पहर हो दोपहर हो,
सदियों से उड़ रहा है,
अब तो ठहर जा अरे मुसाफिर,
कितना ऊपर जाएगा,
तू चील है या चमगादड़,
कितने पंख फैलाएगा,,,।।
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