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मदहोश पंछी

                
                                                         
                            एक खग वेग भर रहा गगन में,
                                                                 
                            
मंजिल की रफ्तार में,
एक पहर हो दोपहर हो,
सदियों से उड़ रहा है,
अब तो ठहर जा अरे मुसाफिर,
कितना ऊपर जाएगा,
तू चील है या चमगादड़,
कितने पंख फैलाएगा,,,।।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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6 वर्ष पहले

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