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ग़ज़ल _ बेहद इश्क़

                
                                                         
                            वो घनी ज़ुल्फ़ों का सय्याद अब मेरी क़फ़स में है
                                                                 
                            
मोहब्बत ही आज़ादी है सब मोहब्बत के ही बस में है

आशिक़ को ऐसे है माशूक़ की चाहत
जैसे वो दीवाना ख़ुदा की दस्तरस में है

हमारे दिल-ओ-ज़िहन में है भले माशूक़
लेकिन ख़ुदा हमारी नफ़स-नफ़स में है

कौन है वो जिसे वस्ल की हवस हो
हम तो 'नूर' गुज़र जाने की हवस में हैं
-नूर हसन
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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