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हाँ, आज मैं अनशन पर हूँ!

                
                                                         
                            आज मैं भी अनशन पर हूँ,
                                                                 
                            
प्रेम की जीत के लिए।

पहले प्रेम को जीताना है,
फिर किसी और चीज़ पर ध्यान देना है।

मैंने देखे हैं प्रेम में हारे हुए लोग,
बीमार हुए लोग,
बेसहारा,
बेसबर,
बेदअदब,
बेपरवाह,
बेनियाज़।

खुदगर्ज़ी, एतराज़ी, चालबाज़ी के बीच
प्रेम को नाकारा, निकम्मा समझकर
सज़ा दी गई है।

प्रेम पड़ा है सड़क पर,
रो रहा है,
जलती तपिश सह रहा है।

हाँ, आज मैं अनशन पर हूँ।

आज उसके लिए बोलना ज़रूरी है,
जो दिखाई नहीं देता।

क्या आंदोलन सिर्फ उसके लिए है
जो आँखों के सामने हो?

जो दिखाई न दे,
क्या वह जीवित नहीं होता?

फिर तो ईश्वर की इबादत भी हराम हो जाए,
अगर तुमने सिर्फ आकार में ही प्रार्थना अर्पित की।

खुदा, भगवान, ईश्वर,
कितने नाम बना डाले हमने,
अपने लिए, अपनी आँखों के लिए,
अपने भ्रमों के लिए।

पर दिल को तो सिर्फ प्रेम चाहिए,
न कोई शब्द,
न कोई आकार,
न कोई रंग,
न कोई यौवन।

इसीलिए,
हाँ, आज मैं अनशन पर हूँ।

इंसाफ किसके लिए माँगूँ?
उनके लिए जिनके हृदय में प्रेम नहीं?

प्रेम नहीं तो सही,
इंकार नहीं,
पर इकरार तो उससे कहीं ज़्यादा है।

यह झूठ है,
हाँ यह झूठ है,
कि किसी को किसी से प्रेम है।

लोग तो अपने-अपने आईने से प्रेम करते हैं,
लिंग, जाति, संप्रदाय,
रंग…

यही तो है
प्रेम करने का हमारा ढंग।

प्रेम को हमने नाम देकर
कितना ही बाँझ क्यों न बना दिया हो,
पर अपनी हवस से
हम कभी बाज़ नहीं आए।

हाँ, आज मैं अनशन पर हूँ।

देखो, वह धूप में झुलसता प्रेम।
देखा क्या?

अगर देखा है,
तो बताना।

फिर से धोखा खा गए न?
फिर आँखों से ही उसे खोजने लगे न?

यही गलती है।

और इसी गलती के कारण
आज मैं भूख और प्यास की अग्नि
अपने भीतर लिए बैठा हूँ।

दिल रो रहा है,
गरज रहा है,
पर उसकी पुकार सुनने वाला
अभी कोई नहीं।

आँखों की सुनने वाले बहुत हैं,
पर दिल की कौन सुनता है?

हाँ, आज मैं अनशन पर हूँ।
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3 महीने पहले

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