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वानप्रस्थ

                
                                                         
                            "वानप्रस्थ"
                                                                 
                            

जोड़ी का एक पंछी उड़ गया,
दूसरा घोंसले में बैठा है अकेला।
दिवारें वही हैं, पर गूंज नहीं,
चाय की दो प्याली, अब एक रह गई।

बच्चे बड़े हो गए, अपने पंख पसारे,
उनका आकाश अब और कहीं है।
फोन पर "ठीक हूँ पापा" कहकर रख देते,
और हम "हाँ बेटा" कहकर चुप हो जाते।

घर वालों के मन में नफरत नहीं,
बस अपनी-अपनी दौड़ है।
रसोई में आवाज़ कम हो गई,
टीवी की आवाज़ ज्यादा हो गई।

सोचता हूँ - क्या यही बुढ़ापा है?
एक कमरा, एक चारपाई, एक अतीत।
दरवाजे पर दस्तक का इंतजार,
और शाम को दवाई का समय।

पर ठहर... ये अकेलापन सज़ा नहीं,
ये साक्षी बनने का समय है।
जब कोई माँग नहीं, कोई अपेक्षा नहीं,
तब "मैं" से मिलने का समय है।

नदी किनारे बैठ जाओ,
पत्तों को गिरते देखो।
कोई साथ नहीं, पर सब कुछ अपना है।
धूप भी, छाँव भी, सन्नाटा भी।

जो गए वो अपना फर्ज निभाकर गए,
जो रहे वो अपना बोध निभाएं।
बोझ नहीं हैं हम, हम दीपक हैं।
घर में नहीं जलें तो मन में जलें।

उम्र लंबी हो तो शिकायत नहीं,
उपहार है।
कि अब ईश्वर को सुनने का समय है।
कि अब खुद को पढ़ने का समय है।

अकेले नहीं हैं हम,
हमारे साथ हम हैं।
और हमारे साथ... वो है।
जो कभी अकेला छोड़ता ही नहीं।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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