"सुन लिया तो सुलझ गए"
ज़ुबान तेज चले, दिमाग तेज चले,
तो रिश्तों की गाड़ी, धीरे-धीरे चले।
अपने बारे में बुरा, कभी मत सोचो तुम,
ये काम तो पड़ोसी, बखूबी करते हैं।
अहंकार की बस, एक ही खराबी है,
गलत होकर भी, लगे सही ही है।
हक़ीक़त आज की, बस इतनी सी है,
सुन लिया तो सुलझे, सुना दिया तो उलझे।
ज़िंदगी की किताब के, कुछ पन्ने ऐसे,
दिल तो तोड़ देते, आँखें खोलते वैसे।
गलती से सबक लेना, सुधार ही सार है,
चिंता से कभी न, बदला परिणाम है।
कभी-कभी अंजान रहना, भी जरूरी है,
सब जान लेना भी, तनाव ही बढ़ाता है।
दूसरे का दर्द तब, समझ में आएगा,
उसकी नज़र से जब, जगत देखा जाएगा।
अपनी दृष्टि से नहीं, उसकी हालत से देखो,
तभी तो पीड़ा का, सच्चा अर्थ सीखो।
सुख-सुविधा बहुत है, पर शांति नहीं,
तो समझो तुमने, सुख को गलत चीन्हा है।
सुख बाहर नहीं, मन के भीतर है,
शांति बिना तो, सुख भी बेघर है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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