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सीख लूँगा

                
                                                         
                            "सीख लूँगा"
                                                                 
                            

जो आता है, उसे पूरे मन से करूँगा,
जो नहीं आता, उसे मैं सीख लूँगा।
यही सोच मेरी नींव, यही मेरी पहचान है,
इसी से बनता आत्मविश्वास, इसी से विकास का जहान है।

कोई भी यहाँ सब कुछ सीखकर नहीं आता,
हर उपलब्धि अभ्यास और गलतियों से पाता।
डर कर जो चुनौतियों से मुँह मोड़ लेते हैं,
वो भीड़ में खो जाते हैं।
जो सीखने का अवसर मानकर आगे बढ़ते हैं,
वही समय के साथ अपनी पहचान गढ़ते हैं।

कभी मत कहना "मुझसे नहीं होगा",
बस इतना कहना "अभी नहीं आता, पर सीख लूँगा"।
सीखने की इच्छा, समझने का धीरज,
और आगे बढ़ने का साहस —
यही तो साधारण को असाधारण बना देता है।

इसलिए हर दिन कुछ नया सीखिए,
खुद को रोज़ थोड़ा निखारिए।
गिरो तो संभलो, रुको मत, बढ़ते रहो,
क्योंकि जो सीखता रहता है, वही जीतता रहता है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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