सावन की छुअन से शीतल बयार बहे, तन का ताप मिटे, मन को चैन मिले।
सौंधी माटी की खुशबू जब उठे, लगे धरती पर ईश्वर खुद उतर मिले।
आम-नीम की डाली पर झूले सजे, बच्चे-बूढ़े सब झूलने को आतुर।
किलकारी गूंजे गली-गली में, उम्र का फासला भी मिट जाए भरपूर।
चूड़ी वाले की आवाज गूंजे कानों में, मेहंदी वाली सजाए हाथों को।
तीज पर झूले, राखी पर धागा, त्योहारों से महके पूरा महीनों को।
भाई की कलाई पर बहन डोर बांधे, रक्षा का वचन संग आशीष मिले।
बलि-लक्ष्मी, कृष्ण-द्रौपदी की कथा, इस धागे में इतिहास भी खिले।
सोमवार को मंदिर सजे, घंटी बजे, भोले के भक्त जलधारा चढ़ाएं।
बेलपत्र, धतूरा, फूल और दूब से, श्रद्धा के दीप हर मन में जल जाएं।
सावन केवल बरसात का नाम नहीं, ये रिश्तों का, भक्ति का संगम है।
जो छू ले एक बार इस छुअन को, वो जीवन भर इसका हमदम है।
बादल गरजे, पात-पात मुस्काए, कोयल की कूक में मल्हार समाए।
सावन की छुअन बसी मन के कोने में, हर बूंद में पुरानी यादें लौट आए।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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