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सावन के गीत

                
                                                         
                            काली घटा छाई, रिमझिम बरसात आई, धरती ने भीगी चूनर तन पर ओढ़ ली।
                                                                 
                            
पपीहा बोले "पिउ-पिउ", मोर नाच उठे, प्रकृति ने हरियाली की चुनर बिछा ली।

पुराने पीपल की डाल पर झूले पड़े, रस्सी खींचो तो लगे गगन छू जाए।
सखियाँ झूलें, कजरी के गीत गाएँ, बचपन की मीठी यादें फिर लौट आए।

हाथों में हरी चूड़ी, माथे पर बिंदी सजे, मेहंदी की महक से आँगन महक जाए।
थाल में घेवर, फेनी की मिठास घुले, स्वाद में सावन का त्योहार उतर आए।

तीज आई तो झूले और गीत सजे, गाँव-गाँव में उमंग की लहर लहराए।
राखी बंधी तो भाई ने वचन दिया, रिश्तों की डोर और गहरी हो जाए।

शिवालय में घंटी की टन-टन गूंजे, जलधारा शिवलिंग पर अविरल गिरे।
"बम बम भोले" के जयकारे गूंजें, भक्ति की गंगा हर मन में बहे।

सावन के ये गीत न कभी पुराने हों, हर साल नई उमंग से गाए जाएँ।
जो बीत गया वो भी इनमें समाया है, जो आएगा वो भी इनमें गुनगुनाए।

बादल गरजे, पवन सरसराए, कोयल की कूक में मल्हार उतर आए।
सावन केवल मौसम नहीं जगदीश, ये दिल की धड़कन, ये जीवन का तराना है।
-- जगदीश प्रसाद शर्मा
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7 घंटे पहले

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