"संयम का दान"
हे ईश्वर! हर भोर तेरे द्वार पर आकर मांगते हैं,
क्योंकि हम अपूर्ण हैं, तुझसे ही सब मांगते हैं।
तू ही दाता, तू ही पूर्ण, तू ही पालनहार है,
आज हमें संयम का अनमोल वरदान दे।
मानसिक संयम दे प्रभु, कुविचार पास न आएं,
चिंता, ईर्ष्या, घृणा के बादल मन में न छाएं।
वाचिक संयम दे दाता, झूठ-चुगली दूर रहे,
निंदा के दलदल से मेरी वाणी को मुक्त करे।
ऐन्द्रिय संयम दे स्वामी, चंचल इंद्रियां बस में हों,
लोभ-मोह के प्रलोभन देखकर भी आँखें नम न हों।
शारीरिक संयम दे नाथ, आलस्य तन से भागे,
विलास-वासना की आंधी मेरे द्वार न खड़के।
आर्थिक संयम दे प्रभु, लोभ-संग्रह मिट जाए,
रिश्वत के अंधकार में मेरा हाथ न जाए।
श्रेष्ठ धन देकर मुझे, सेवा का पथ दिखा दे,
धर्म से कमाऊं, धर्म पर ही उसे लुटा दे।
सारे दोष मिटाकर प्रभु, कल्याण में थाप दे,
संयमी जीवन देकर, आत्मा को पावन कर दे।
जब संयम का दीप जलेगा भीतर मेरे,
तब तेरा प्रकाश उतरेगा जीवन के अंधेरे।
ऐसी कृपा कर दो दाता, संयमी बना दो !!!
ॐ शांति शांति शांति!
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X