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संयम और साक्षी भाव

                
                                                         
                            ये हाथ-पैर, ये साँसों की डोरी, बुढ़ापे की लकीरें, रोगों की कोठरी।
                                                                 
                            
आज जवान कल बूढ़ा हो जाएगा, ये दीपक एक दिन बुझ जाएगा।

शस्त्र काटें न इसे, आग जलाए न, पानी भिगोए न, वायु सुखाए न।
फिर भी मैं इसे "मैं" कहकर रोता, जो रोज आईने में बदलता।

मैं वो नहीं जो मिट्टी से बना, मैं वो हूँ जो मिट्टी में बसा।
देह मेरी सवारी है बस, मैं सारथी हूँ... शरीर नहीं हूँ।

विचारों का मेला लगा है भीतर, चिंता की आंधी, ईर्ष्या की लहर।
कल की स्मृति, कल की आस, मन इसी में घुट-घुट कर सांस।

पर ठहर... कौन देख रहा ये तमाशा? कौन गिन रहा विचारों की भाषा?
लहर मैं नहीं, मैं सागर का किनारा, आंधी मैं नहीं, मैं आकाश का सितारा।

मन आता-जाता मेहमान है, मैं उसका मूक मेजबान हूँ।
विचारों को देखने वाला ही मैं, मन का स्वामी... मन नहीं हूँ।

आए तो दिल धड़का, गए तो आंख भरी, अपेक्षा की डोर में बंधा-बंदा मरा।
मोह में कहा "ये मेरे हैं", बिछोह में कहा "मैं अकेला हूँ"।

पर सोच... नदी में बुलबुले कितने, बनते हैं, फूटते हैं, कितने?
कोई किसी का नहीं, सब राही हैं, मिलते हैं, बिछड़ते हैं, फिर कहीं हैं।

मैं न किसी का, न कोई मेरा, संबंधों का साक्षी हूँ बस तेरा।
प्रेम करूं पर बंधन न रखूं, आएं तो स्वागत, जाएं तो मौन... संबंध नहीं हूँ।

सेवा की, समर्पण किया, पसीना बहाया, "मैंने किया" का भाव भी साथ लगाया।
फल की चिंता, यश की चाह, कर्तापन के बोझ तले आह।

फिर एक दिन समझ आया ये राज, नदी बहती है, पर कहती नहीं "मैंने सिंचा"।
दीपक जलता है, पर मांगता नहीं शुक्रिया, पवन चलती है, पर लेती नहीं बधाई।

33 बरस पढ़ाया, पर पढ़ाने वाला कौन? हुआ सो हुआ, मैं तो बस बांसुरी का सुर।
कर्म किया पर कर्ता न बना, निमित्त मात्र... कर्ता नहीं हूँ।

अब न देह रही, न मन का शोर, न नाम रहा, न कोई और।
संबंधों की गांठें खुल गईं, कर्तव्य का बोझ भी ढुल गया।

बचा तो बस एक प्रकाश, जो अंधेरे में भी है पास।
जो जन्म से पहले था, मृत्यु के बाद रहेगा, जो सबमें है और सबसे न्यारा।

वही मैं हूँ, वही तू है, वही सबमें समाया।
"मैं शरीर नहीं हूँ" — इस बोध में ही मुक्ति का द्वार आया।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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