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सम्मान का मोहजाल

                
                                                         
                            "सम्मान का मोहजाल"
                                                                 
                            

सम्मान का मोहजाल, बड़ा गहन है भाई,
ज्ञानी ध्यानी इसमें, सभी फँसे हैं भाई।

सम्मान की चिंता में, जो जीवन जीता है,
देने वाले के हाथों, वो बिक सा जाता है।

वो कहे पैदल चलो, तो पैदल चलता है,
वो कहे भूखा रहो, तो भूखा रहता है।

वो कहे वस्त्र त्यागो, तो वस्त्र त्यागता है,
वो कहे एक टांग पर, तो वहीं खड़ा रहता है।

कहे प्राण दे दो, तो प्राण दे देता है,
मरने पर सम्मान मिलेगा, ये सोच मर लेता है।

अपना स्वतंत्र अस्तित्व, वहीं मिट जाता है,
कठपुतली बन कर वो, औरों का नाच नाचता है।

सारी प्राण ऊर्जा, इसी में खर्च होती है,
अध्यात्म के लिए फिर, कुछ नहीं बचती है।

सोचो अगर ये लेना-देना, बंद हो जाए,
निन्यानवे प्रतिशत ऊर्जा, खुद में बच जाए।

न कोई सम्मान दे, न कोई सम्मान ले,
न कोई ऊँचा बने, न कोई नीचे रहे।

तब मुक्त होगा मानव, बंधन टूटेगा सारा,
सरल होगा अध्यात्म, मिलेगा किनारा।

जो सम्मान से छूटा, वही तो मुक्त हुआ,
जो भीतर झाँका, वही तो युक्त हुआ।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
9 घंटे पहले

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