"समभाव दे"
हे परमात्मा, सुनो मेरी पुकार,
सुख में भूलें तुझे, भर जाएं अहंकार।
दुख की आंच लगे तो करें शिकायतें,
क्रोध में बोलें वचन, जो चुभें हथियार।
अज्ञान के अंधेरे में मोह जाल बिछाएं,
माया की उलझन में खुद को फंसाएं।
अहंकार की अकड़ में द्वेष पाले जाएं,
बदले की आग में खुद ही जल जाएं।
पर तू कैसा है, ओ पालनहार?
न राग न द्वेष, न कोई तकरार।
तटस्थ खड़ा है तू जग के पार,
समदर्शी, समभाव का अवतार।
ऋत के तू ही नियंता, कर्मों का लेखा,
फल देने वाला, तू ही एकलेखा।
न खुशी में फूलता, न गम में ढरके,
शांत सरोवर सा, तू अडिग खड़ा है।
हे ईश्वर, हमको भी वो गुण दे,
विकारों की जंजीरों से मुक्त कर दे।
सुख आए तो न इतराएं, दुख आए तो न घबराएं,
हर उतार-चढ़ाव में धीरज का दीप जलाएं।
कीचड़ में रहकर भी कमल से रहें,
निर्लिप्त, निर्मल, तुझसे जुड़े रहें।
शांति दे, सहनशक्ति दे, समभाव दे,
करुणा कर, प्रभु, कृपा की छांव दे।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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