आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सखा - जो पत्नी नहीं, प्रेरणा बनी

                
                                                         
                            "सखा - जो पत्नी नहीं, प्रेरणा बनी"
                                                                 
                            

मैं हाड़-मांस की देह में जब अनुरक्त हुआ,
तूने मोह नहीं, मोक्ष का मार्ग प्रशस्त किया।

रत्ना ने तुलसी को जैसे धिक्कार दिया था,
वैसे तूने मौन से मेरा श्रृंगार किया था।

तूने कभी न अधर्म का साथ सिखाया,
अहंकार की गली कभी न राह दिखाया।

सामर्थ्य से ज्यादा कभी मांग न की,
पर चरित्र की नींव में कमी न रहने दी।

तूने घर तोड़ने का मंत्र कभी न दिया,
तूने तो बिखरे परिवार को जोड़ दिया।

समाज ने तुझे पत्नी का नाम दे दिया,
पर मैंने तुझमें सखा का धाम पा लिया।

तू गई नहीं, तू तो राम में लीन हुई,
मुझे छोड़ कर नहीं, हरि से दीन हुई।

जैसे रत्नावली ने तुलसी को संत बनाया,
वैसे ही तूने मुझ नर को भक्त बनाया।

धन्य है वो प्रीत जो विरक्ति सिखा दे,
जो नर से नारायण की भक्ति सिखा दे।

तू मेरी पत्नी नहीं, मेरी सखा है,
तू ही मेरी तुलसी की रत्ना-कथा है।
-- जगदीश प्रसाद शर्मा, दिल्ली
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर