राज्य जीते, युद्ध जीते, कहलाए वो वीर महान,
दुश्मन के किले ढहा दिए, बजा डंका जहान।
सभा में ताली गूँजी, सिर झुके हजारों बार,
पर भीतर एक दुर्बल था, जो हारा था हर बार।
दूसरों पर विजय पाना, कहलाती शक्ति है,
बाहुबल से, वाक्चातुर्य से, मिलती वह युक्ति है।
पर ये जीत क्षणिक होती, कल फिर चुनौती आए,
आज जिसे तुमने झुकाया, वो कल सर उठाए।
असली रण तो भीतर है, जहाँ शत्रु दिखते नहीं,
क्रोध की तलवार उठती, पर कोई वार करता नहीं।
अहंकार का किला ऊँचा, दीवारें अभिमान की,
इच्छाओं की सेना चलती, माँगती बलिदान की।
भय रातों को सताता, संदेह नींद हर लेता,
लोभ कानों में फुसफुसा, "और चाहिए" कह देता।
इनको हराना सबसे कठिन, न शस्त्र काम आए,
न युक्ति, न धन, न मित्र, यहाँ बस "स्व" ही लड़ पाए।
सोचो, जो स्वयं का स्वामी नहीं, वो जग का क्या होगा?
जो मन का दास बना रहे, वो सिंहासन का क्या होगा?
दूसरे को बाँध लोगे, पर बंधन में खुद रह जाओगे,
दूसरे की जुबान बंद कर, अपने भीतर घुट जाओगे।
सच्ची विजय वो नहीं कि जग तुम्हारे आगे नतमस्तक हो,
सच्ची विजय वो है जब क्रोध आए और तुम मुस्कुराकर रुक जाओ।
सच्ची विजय वो नहीं कि सब तुम्हारी हाँ में हाँ मिलाएँ,
सच्ची विजय वो है जब इच्छा भड़के और तुम "नहीं" कह पाएँ।
जब अपमान मिले और प्रतिशोध का ज्वार न उठे,
जब प्रशंसा मिले और अहंकार का घड़ा न फूटे।
जब हार मिले और धैर्य का धागा न टूटे,
जब लाभ मिले और लोभ का हाथ न लूटे।
बाहरी जीत से राज्य मिलता, भीतरी जीत से शांति,
बाहरी जीत से नाम मिलता, भीतरी जीत से भक्ति।
दूसरों को हराकर तुम बस एक युद्ध जीतोगे,
खुद को जीतकर तुम जन्म-मरण के चक्र को जीतोगे।
इसलिए हे पथिक, तलवार म्यान में रख दो,
सबसे बड़ा संग्राम अब आरंभ कर दो।
आईना सामने रखो और खुद से लड़ जाओ,
जिस दिन "स्वयं" पर विजय पाई, समझो ईश्वर को पा जाओ।
क्योंकि...
दूसरों पर विजय शक्ति है, पर स्वयं पर विजय मुक्ति है।
और जो मुक्त हो गया, वही जग में सबसे शक्तिमान है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा, दिल्ली
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