"सबसे बड़ा महल"
बुद्ध ने त्यागा था महल ये जानने को,
मन की शांति कैसे पाई जाती है।
आज इंसान त्याग रहा है शांति को,
महलों की चाह में भटक जाता है।
धन से खरीदी जाती हैं दीवारें ऊँची,
वैभव से सजते हैं कमरे सारे।
पर संतोष, प्रेम और चैन का सौदा,
किसी बाजार में नहीं होता न्यारे।
चमक-दमक बाहर की झूठी बाजी है,
सच्चा सुख भीतर के आँगन में।
संयम में, संस्कार में, संतुलन में है,
और अपनों के मीठे बंधन में।
दौड़ो, कमाओ, समृद्धि भी लाओ,
पर इतनी भी दौड़ मत लगाएं।
कि मंजिल मिल जाए पर रास्ते में,
मन की शांति पीछे छूट जाएं।
सबसे बड़ा महल वो नहीं,
जिसकी छत सोने की हो।
सबसे बड़ा महल वो है,
जहाँ मन शांत, हृदय खुश हो।
जहाँ परिवार हँसे प्रेम से,
और विश्वास की दीवारें हों।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
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