"सावन को आने दो"
सावन को आने दो, घटा घनेरी छाने दो,
पीपल की डालों पर झूले फिर से ताने दो।
दो सखियां झूलें झूले, कजरी गीत गाएं,
तीसरी सखी धक्का दे, चूड़ियाँ खनकाए।
हल्की हल्की फुहार पड़े, भीगे चुनरिया,
खेत खलिहान हरियाए, लहराए हरिया।
मेंढक की टर-टर बोले, कोयल कूक सुनाए,
धरती की खुशबू मन को भीतर तक भाए।
कच्ची मिट्टी की सोंधी महक चहुं ओर बिखरे,
ताल तलैया लबालब, पगडंडी कीचड़ सने।
हरियाली की चादर ओढ़े ये धरती मुस्काए,
मन के सारे मैल धोकर पावन हो जाए।
रोकें ना बादल को, बरसने दो जी भरके,
सूखे मन की प्यास को, भिगोने दो पल भरके।
आओ मिलकर झूमें, गाएं सावन के तराने,
प्रकृति के इस उत्सव को, खुलकर आने दो।
-- जगदीश प्रसाद शर्मा
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