सर्वगुण संपन्न न कोई, यह जग की पहचान है,
हर मन में कुछ ज्योति जले, कुछ छाँव भी अनजान है।
गुण अगर हैं चार किसी में, दो कमी भी साथ हैं,
पूर्णता की चाह में जो, रिश्ते करे बरबाद हैं।
दोष ही यदि ढूँढते हम, हर हृदय में छेद करें,
पास अपने फिर न कोई, सूना जीवन-भेद भरें।
इसलिए छोटी चूक पर, आँख मूँदना सीखिए,
बात-बात पर टोकना छोड़ो, प्रेम से ही रीझिए।
समझ से सींचो संबंध को, क्षमा का जल छिड़काइए,
आदर की धूप दिखलाकर, विश्वास रोज़ उगाइए।
रिश्ते तर्क से नहीं बँधते, बँधते हैं अपनत्व से,
सहनशीलता की डोर थामो, कटुता मिटे ममत्व से।
जहाँ अहंकार घट जाता, समझदारी बढ़ जाती है,
वहीं मधुरता टिकती है, प्रीत अमर कहलाती है।
गुणों को सिर-माथे रखिए, दोष सुधारने मौका दो,
गरिमा रिश्तों की मत तोड़ो, स्नेह-दीप जलता रखो।
यही सूत्र सुखी जीवन का, यही सफलता की राह है,
प्रेम, क्षमा, सम्मान जहाँ हो, वहीं सार्थक प्रवाह है।
- जगदीश प्रसाद शर्मा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X